एष नारायणः कृष्णः फाल्गुनश्च नरः स्मृतः।
नारायणो नरश्चैव सत्त्वमेकं द्विधा कृतम् ।।
:- महाभारत, उद्योग पर्व ४९/२०
भवार्थ:- श्रीकृष्ण नारायण और अर्जुन नर माने गये हैं, नारायण और नर दोनों एक ही सत्ता हैं, परन्तु लोकहित के लिये दो शरीर धारण करके प्रकट हुये हैं।
हम सभी नारायण रुप कृष्ण की पूजा करते हैं, लेकिन नारायण के हृदय में नर रुप अर्जुन बसते हैं और अर्जुन के रोम रोम से जय जय श्रीकृष्ण, जय श्रीकृष्ण की आवाज आती है।
हम सभी नर हैं, तो हमारे हाथ में क्या है? कृष्ण बनें या अर्जुन… जब विचार करते हैं, तो ज्ञात होता है कि हमारे पास नारायण को हृदय में लेकर अर्जुन बनने के अतिरिक्त कोई अन्य संकल्प होना ही नहीं चाहिए। और अर्जुन क्या है, वह एक महोत्साही पुरुषार्थी है। नारायण सशरीर सारथी हैं या नहीं… वह सदैव लोलुपतारहित पराक्रम करता है और इसी कारण नारायण उसको प्रेम करते हैं।
महाभारत ऐसे नर नारायण अर्जुन कृष्ण का चरित है, हमने इसे पढ़ना बन्द कर दिया, उसका मंचन बन्द कर दिया…
और बदले में लेकर क्या आये… नकली चॉकलेटी नायक… और उनकी व्यभिचार कथा।
इन नकली नायकों के प्रभाव के कारण युवा पीढ़ी कहाँ गयी… वह सिगरेट, शराब और व्यभिचार की शिकार हो गयी। युवाओं ने अपना नुकसान किया… क्यों…
क्योंकि उन्हें घुमा कर जीवन भर चलने वाले चिदानन्द की जगह मिनटों अथवा कुछ घण्टे चलने वाले नकली आनन्द और उसके तुरन्त बाद कष्टकारी जीवन….. अधिक अच्छा लगने का भ्रम हो गया।
और यह सब इसलिए कि कुछ लोग असीमित मात्रा में भोग करना चाहते हैं। जहाँ त्यागपूर्वक उपभोग की बात होती थी, वहाँ विलासिता को विकास मान लिया गया।
और इस प्रकार दुर्जनों का एक समूह बनाया गया, जिन्होंने राष्ट्र के अर्जुनों को कुमार्ग पर धकेल दिया।
युवाओं को पुनः सुमार्ग पर लाना सरल नहीं है, किन्तु असंभव भी नहीं है, कृष्ण एवं अर्जुन की कथाओं का मंचन इस दिशा में अभीष्ट सिद्ध करने वाला हो सकता है.