भगवान विष्णु ने वामनावतार रुप में आकर राजा बलि से राज्य लेकर इन्द्र को दे दिया. राज्यलक्ष्मी के स्वाभाविक दुर्गुण गर्व से देवराज पुनः उन्मुक्त हो उठे. उन्होंने ब्रह्मा जी से राजा बलि का पता पूछा तो ब्रह्मा जी ने बताया कि अब वह उष्ट्र, वृषभ, गर्दभ या अश्व रुप में किसी खाली घर में रहते हैं.
देवराज इन्द्र ऐरावत पर सवार हो राजा बलि से मिलने गये. उस समय वह गधे के रुप में एक खाली घर में मिले. इन्द्र ने राजा से पूछा कि हे दानवराज! इस समय तुमने कैसा विचित्र वेश बना रखा है, तुम्हारा छत्र, चामर, वैजयन्ती माल और सिंहासन आदि कहाँ है.
राजा बलि ने उत्तर दिया कि हे इन्द्र! इस समय तुम मेरे छत्र, चामर, सिंहासनादि उपकरणों को नहीं देख सकते, जब कभी मेरे दिन वापस लोटेगें तो तुम उन्हें देख सकोगे.
इस समय तुम अपने ऐश्वर्य के मद में आकर मेरा उपहास कर रहे हो, यह तुम्हारी तुच्छ बुद्धि का ही परिचायक है. लगता है कि तुम अपने पुराने दिनों को भूल गये हो, पर सुरेश! तुम्हें समझ लेना चाहिए कि तुम्हारे वह दिन पुनः लौटेंगे. तुम यह भी जान लो कि इस विश्व में कोई भी वस्तु सुनिश्चित और सुस्थिर नहीं है, काल सबको नष्ट कर डालता है.
ऐश्वर्यों की प्राप्ति या विनाश किसी मनुष्य के अधीन नहीं है, मनुष्य की कभी उन्नति होती है और कभी अवनति. समय से ही ऊँचा पद मिलता है और समय ही गिरा देता है. तुम अच्छी तरह से जानते हो कि सब मेरे अधीन थे, यहाँ तक कि जिस दिशा में राजा बलि हों, उस दिशा को भी नमस्कार है, लोग ऐसा कहते और करते थे.
अत्यधिक वेग से भी दौड़कर कोई मनुष्य काल को नहीं लाँघ सकता. अत: जब मुझपर काल का आक्रमण हुआ तो मैं भी पलटा खाकर इस दशा में पहुँच गया, तो किस गरजते और तपते हुये पर काल का चक्र न फिरेगा.
विद्या, तपस्या, दान और बन्धु बान्धव भी काल ग्रस्त मनुष्य की रक्षा नहीं कर सकते. मैं अभी चाहूँ तो तुम्हें मुष्टि प्रहार कर गिरा दूँ. किन्तु मेरे लिए यह समय सह लेने का है, पराक्रम दिखलाने का नहीं. इसलिए इस रुप में मैं अध्यात्म निरत हो रहा हूँ.
राजा बलि के विशाल धैर्य को देखकर इन्द्र ने उनकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आप मेरी ओर निश्चिंत रहकर, निरोग रहकर समय परिवर्तन की प्रतीक्षा करें. ऐसा कहकर देवराज इन्द्र चले गये और राजा बलि पुनः अपने स्वरुप चिन्तन में स्थिर हो गये.
महाभारत, शान्ति पर्व, मोक्ष धर्म, अध्याय 223-227
आपको एवं परिवार को परिवर्तिनि एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ.
अवधेश.