Author: Chhatrapal singh
राव चन्द्रसेन

राव चंद्रसेन को मुगलकाल का मारवाड़ का महान सैनानी कहा गया है ।राव चंद्रसेन मारवाड़ (जोधपुर) के मालदेव के पुत्र थे ।इनको अपने भाइयों -उदय सिंह और राम के साथ उत्तराधिकार का युद्ध लड़ना पड़ा ।राव चंद्रसेन को अपने शासन के लगभग 19 वर्ष तक अपनी मातृ भूमि की आजादी के लिए जूझते और ठोकर खाते रहे और अंत में देश की आजादी के लिए ही उन्होंने अपने प्राण भी गंवा दिए ।दुर्भाग्यवश ,चंद्रसेन सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री को छिपाये जाने के फलस्वरूप चंद्रसेन का व्यक्तित्व प्रकाश में नहीं आ पाया ,लेकिन आधुनिक अनुसंधानों ने आखिर इस विस्मर्त सेनानी को सामने ला ही दिया ।इसी लिए अनेक इतिहासकार चंद्रसेन को मारवाड़ का भुला हुआ नायक भी कहते है ।
जन्म
राव चन्द्रसेन का जन्म विक्रम संवत 1598 श्रावण शुक्लाअष्टमी (30 जुलाई, 1541 ई.) को हुआ था।
भाइयों का विद्रोह—
राव मालदेव ने अपने जीवन काल में ही चंद्रसेन के बड़े भाइयों –राम सिंह और उदय सिंह को उत्तराधिकार से वंचित करके चंद्रसेन को अपना उत्तराधिकारी बना कर जोधपुर में गृहयुद्ध के बीज बो दिए थे ।राव चंद्रसेन स्वाभिमानी और वीर योद्धा थे ।वे जोधपुर की गद्दी पर बैठते ही इनके बड़े भाइयों राम और उदयसिंह ने राजगद्दी के लिए विद्रोह कर दिया। मारवाड़ के बहुत से राजपूत सरदारों ने इन तीनों विद्रोही भाइयों को अपने अपने तरीके से सहायता दी ।चंद्रसेन भाइयों के विद्रोह को तो दवाने में सफल रहे लेकिन असंतुस्ट भाई चंद्रसेन से बदला लेने के लिए अवसर और सहारे की तलाश में रहे ।चंद्रसेन के दोनों भाईयों ने उनके विरुद्ध अकबर के दरबार में सहायता की प्रार्थना के लिए जा पहुंचे ।वास्तव में चंद्रसेन के दोनों भाइयों ने मुगलों के साथ गठबंधन कर लिया ।
सम्राट अकबर की नीति ही यही थी कि राजपूतों की फुट से पूरा पूरा राजनितिक लाभ उठाया जाय ।अकबर नेचंद्रसेन और उनके भाइयों की फूट का लाभ लेने के लिए नागौर के मुग़ल हाकिम हुसैन कुलीबेग को सेना देकर 1564 में जोधपुर पर आक्रमण कर दिया जिसमें चंद्रसेन के भाई भी सामिल थे ।चंद्रसेन को जोधपुर का किला खाली करके भाद्राजून चला जाना पड़ा ।
मुग़लों से संघर्ष—
जोधपुर छूटने के बाद साधन हीन चंद्रसेन की आर्थिक स्थिति निरंतर बिगड़ती गई ।परिस्थितियों वश चंद्रसेन ने यह उचित समझा कि समझा कि अकबर के साथ सन्धि कर ली जाय ।सन् 1570 ई0को बादशाह अकबर जियारत करनेअजमेर आया वहां से वह नागौर पहुंचा, जहाँ सभी राजपूतराजा उससे मिलने पहुंचे। राव चन्द्रसेन भी नागौर पहुंचा, पर वह अकबर की फूट डालो नीति देखकर वापस लौट आया। उस वक्त उसका सहोदर उदयसिंह भी वहां उपस्थित था, जिसे अकबर ने जोधपुर के शासक के तौर पर मान्यता दे दी। कुछ समय पश्चात मुग़ल सेना ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया, पर राव चन्द्रसेन वहां से सिवाना के लिए निकल गए। सिवाना से ही राव चन्द्रसेन ने मुग़ल क्षेत्रों, अजमेर, जैतारण,जोधपुर आदि पर छापामार हमले शुरू कर दिए। राव चन्द्रसेन ने दुर्ग में रहकर रक्षात्मक युद्ध करने के बजाय पहाड़ों में जाकर छापामार युद्ध प्रणाली अपनाई। अपने कुछ विश्वस्त साथियों को क़िले में छोड़कर खुद पिपलोद के पहाड़ों में चले गए और वहीं से मुग़ल सेना पर आक्रमण करके उनकी रसद सामग्री आदि को लूट लेते। बादशाह अकबर ने उनके विरुद्ध कई बार बड़ी सेनाएं भेजीं, पर अपनी छापामार युद्ध नीति के बल पर राव चन्द्रसेन अपने थोड़े से सैनिको के दम पर ही मुग़ल सेना पर भारी रहे।2 वर्ष तक युद्ध होता रहा और राठौड़ों ने ऐसा सामना किया की जनवरी 1575 ई0 में आगरा से और सेना भेजनी पडी ।परन्तु इस बार भी मुगलों को सफलता नहीं मिली जिसके कारण अकबर बड़ा नाराज हुआ ।इसके बाद जलाल खान के नेतृत्व में सेना भेजी परन्तु जलाल खान स्वयं मार डाला गया ।चौथी बार अकबर ने शाहबाज खां को भेजा जिसने 1576 ई0 में अंततः सिवाना दुर्ग पर अधिकार कर लिया ।
1576 -77 ई0में सिवाना पर मुग़ल सेना के आधिपत्य के बाद राव चन्द्रसेन मेवाड़, सिरोही, डूंगरपुर और बांसवाड़ा आदि स्थानों पर रहने लगे लेकिन मुग़ल सेना उनका बराबर पीछा कर रही थी । सन् 1579ई0 में चंद्रसेन ने अजमेर के पहाड़ों से निकल कर सोजत के पास सरवाड़ के थाने से मुगलों को खदेड़ दिया और स्वयं सारण पर्वत क्षेत्र में जारहे ।उसी क्षेत्र में सचियाव गांव में 1580ई0 में उनका देहांत हो गया । अकबर उदयसिंह के पक्ष में था, फिर भी उदयसिंह राव चन्द्रसेन के रहते जोधपुर का राजा बनने के बावजूद भी मारवाड़ का एकछत्र शासक नहीं बन सका। अकबर ने बहुत कोशिश की कि राव चन्द्रसेन उसकी अधीनता स्वीकार कर ले, पर स्वतंत्र प्रवृति वाला राव चन्द्रसेन अकबर के मुकाबले कम साधन होने के बावजूद अपने जीवन में अकबर के आगे झुके नहीं और विद्रोह जारी रखा।चंद्रसेन और प्रताप की एक दूसरे से तुलना करना तो कठिन है ,लेकिन यह अवश्य सत्य है कि चंद्रसेन राजपूताने के उन शक्तिशाली राजाओं में से एक थे जिसने अकबर को लोहे के चने चबा दिए थे ।डिंगल काव्य में चंद्रसेन को श्रद्धान्जली इस प्रकार दी गई —
अंडगिया तुरी ऊजला असमर
चाकर रहन न दिगीया चीत
सारै हिन्दुस्थान तना सिर
पातळ नै चंद्रसेन प्रवीत
अर्थात —जिनके घोड़ों को शाही दाग नहीं लगा ,जो उज्जवल रहे शाही चाकरी के लिए जिनका चित्त नहीं डिगा ,ऐसे सारे भारत के शीर्ष थे राणा प्रताप और राव चंद्रसेन ।मैं ऐसे भूले विसरे नायक अदम्य साहसी योद्धा को सत् सत् नमन करता हूँ ।जय हिन्द ।जय राजपूताना ।।
गोरा-बादल

भारत की पावन धरती ने कई महान एवं वीर, पराक्रमी योद्धाओं को जन्म दिया है। गोरा एवं बादल उन्ही वीर योद्धाओं में से एक है ,ये धरती हमेशा उनकी कृतज्ञ रहेगी! तो आइए जानते हैं उन दो महान योद्धाओं के बारे में
गोरा-बादल
जानिए इन अविस्मरणीय राजपूत योद्धाओं के बारे में
गोरा तत्कालीन चित्तौड़ के सेनापति थे एवं बादल उनके भतीजे थे। दोनो अत्यंत ही वीर एवं पराक्रमी योद्धा थे, उनके साहस, बल एवं पुरुषार्थ से सारे शत्रु डरते थे। गोरा एवं बादल इतिहास के उन गिने चुने लड़ाकों में से एक थे जिनके पास बाहुबल के साथ साथ तीव्र बुद्धि भी थी।
इनकी बुद्धि एवं वीरता ने उस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया जिसे कोई और शायद ही कर पाता ।
ये ऐसे योद्धा थे जो दिल्ली जाकर खिलजी की कैद से राणा रतन सिंह को छुड़ा लाये थे । इस युद्ध में जब गोरा ने खिलजी के सेनापति को मारा था तब तक उनका खुद का शीश पहले ही कट चुका था, केवल धड़ शेष रहा था । यह सब कैसे संभव हुआ इसका वर्णन मैं मेवाड़ के राज कवि श्री श्री नरेन्द्र मिश्र की अत्यंत खूबसूरत कविता के छोटे से अंश से करता हूँ ।
बात उस समय की है जब खिलजी ने धोके से राणा रतन सिंह को कैद कर लिया था, जब राणा जी दिल्ली में खिलजी की कैद में थे तब रानी पद्मिनी गोरा के पास गयीं; गोरा सिंह रानी पद्मिनी को वचन देते हुए कहते है कि –
जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा ।
महाकाल से भी राणा का मस्तक नही कटेगा ।।
तुम निशिन्त रहो महलो में देखो समर भवानी ।
और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारो का पानी ।।
राणा के सकुशल आने तक गोरा नही मरेगा ।
एक पहर तक सर तटने पर भी धड़ युद्ध करेगा।।
एकलिंग की शपथ महाराणा वापस आएंगे ।
महाप्रलय के घोर प्रभंजक भी ना रोक पाएंगे ।।
यह शपथ लेकर महावीर गोरा, राणा जी को वापस चित्तौड़ लेन की योजना बनाने लगे ।
योजना के बन जाने पर वीर गोरा ने आदेश दिया कि –
गोरा का आदेश हुआ सजगये सातसौ डोले ।
और बांकुरे बादल से गोरा सेनापति बोले ।।
खबर भेज दो खिलजी पर पद्मिनी स्वंय आती है ।
अन्य सातसौ सतिया भी वो संग लिए आती है ।।
जब यह खबर खिलजी तक पहुँची तो वो खुशी के मारे नाचने लगा ,उसको लगा कि वो जीत गया है। लेकिन ऐसा नहीं था ,पालकियों में तो सशस्त्र सैनिक बैठे थे । एवं पालकी ढ़ोने वाले भी कुशल सैनिक थे ।।
और सातसौ सैनिक जो कि यम से भी भीड़ सकते थे ।
हर सैनिक सेनापति था लाखो से लड़ सकते थे ।।
एक–एक कर बैठ गए, सज गई डोलियां पल में ।
मर मिटने की हौड़ लगी थी मेवाड़ी दल में ।।
हर डोली में एक वीर , चार उठाने वाले ।
पांचो ही शंकर की तरह समर भत वाले ।।
सैनिकों से भरी पालकियां दिल्ली पहुँच गई ।
जा पहुंची डोलियां एक दिन खिलजी की सरहद में ।
उस पर दूत भी जा पहुँचा खिलजी के रंग महल में।।
बोला शहंशाह पद्मिनी मल्लिका बनने आयी है ।
रानी अपने साथ हुस्न की कालिया भी लायी है ।।
एक मगर फरियाद फ़क़्त उसकी पूरी करवादो ।
राणा रतन सिंह से केवल एक बार मिलवादो ।।
गोरा-बादल | जानिए इन अविस्मरणीय राजपूत योद्धाओं के बारे में
दूत की यह बात सुनकर मुगल उछल पड़ा , उसने तुरंत ही राणा जी से पद्मिनी को मिलवाने का हुक्म दे दिया । जब ये बात गोरा के दूत ने बाहर आकर बताई तब गोरा ने बादल से कहा कि –
बोले बेटा वक़्त आगया है कट मरने का ।
मातृ भूमि मेवाड़ धारा का दूध सफल करने का ।।
यह लोहार पद्मिनी वेश में बंदीगृह जाएगा ।
केवल दस डोलियां लिए गोरा पीछे ढायेगा ।।
यह बंधन काटेगा हम राणा को मुक्त करेंगे।
घुड़सवार कुछ उधर आड़ में ही तैयार रहेंगे।।
जैसे ही राणा आएं वो सब आंधी बन जाएँ।
और उन्हें चित्तोड़ दुर्ग पर वो सकुशल पहुंचाएं।।
गोरा की बुद्धि का यह उत्कृष्ट उदाहरण था । दिल्ली में जहाँ खिलजी की पूरी सेना खड़ी है, वहाँ ये चंद मेवाड़ी सिपाही अपनी योजना, बुद्धि एवं साहस से राणा को छुड़ाने में कामयाब हो जाते हैं। राणा के वहाँ से प्रस्थान करने से पूर्व वीर गोरा, अपने भतीजे बादल से कहते है कि –
राणा जाएं जिधर शत्रु को उधर न बढ़ने देना।
और एक यवन को भी उस पथ पावँ ना धरने देना।।
मेरे लाल लाडले बादल आन न जाने पाए ।
तिल तिल कट मरना मेवाड़ी मान न जाने पाए ।।
यह सुनकर बादल बोले कि –
ऐसा ही होगा काका राजपूती अमर रहेगी ।
बादल की मिट्टी में भी गौरव की गंध रहेगी ।।
बादल के ये वचन सुनकर गोरा ने उसे अपने हृदय से लगा लिया!!! लेकिन इस पूरी योजना का क्रियान्वय किस प्रकार हुआ इसका वर्णन महा कवि श्री श्री नरेंद्र मिश्र कि निम्न पंक्तिया करती है –
गोरा की चातुरी चली राणा के बंधन काटे ।
छांट छांट कर शाही पहरेदारो के सर काटे ।।
लिपट गए गोरा से राणा गलती पर पछताए ।
सेनापति की नमक हलाली देख नयन भर आये ।।
राणा ने पूर्व में जिस सेनापति का तिरस्कार किया था , संकट की घड़ी में आखिर वो ही काम आया ।यह देख कर राणा के नैन भर आए ।। लेकिन अब तक खिलजी के सेनापति को लग गया था कि कुछ गड़बड़ है ।
जब उसने लिया समझ पद्मिनी नहीँ आयी है।
मेवाड़ी सेना खिलजी की मौत साथ लायी है ।।
तो उसने पहले से तैयार सैनिक दल को बुलाया और रण छेड़ दिया ।
दृष्टि फिरि गोरा की मानी राणा को समझाया ।
रण मतवाले को रोका जबरन चित्तोड़ पठाया ।।
उस समय राणा को सुरक्षित अपने देश पहुचना तथा शत्रु देश से निकलना अधिक महत्वपूर्ण था, राणा ने परिस्थिति को समझा और मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया ।।
खिलजी ललकारा दुश्मन को भाग न जाने देना ।
रत्न सिंह का शीश काट कर ही वीरों दम लेना ।।
टूट पड़ों मेवाड़ी शेरों बादल सिंह ललकारा ।
हर हर महादेव का गरजा नभ भेदी जयकारा ।।
निकल डोलियों से मेवाड़ी बिजली लगी चमकने ।
काली का खप्पर भरने तलवारें लगी खटकने ।।
राणा के पथ पर शाही सेनापति तनिक बढ़ा था ।
पर उस पर तो गोरा हिमगिरि सा अड़ा खड़ा था।।
कहा ज़फर से एक कदम भी आगे बढ़ न सकोगे ।
यदि आदेश न माना तो कुत्ते की मौत मरोगे ।।
रत्न सिंह तो दूर न उनकी छाया तुम्हें मिलेगी ।
दिल्ली की भीषण सेना की होली अभी जलेगी ।।
यह कह के महाकाल बन गोरा रण में हुंकारा ।
लगा काटने शीश बही समर में रक्त की धारा ।।
खिलजी की असंख्य सेना से गोरा घिरे हुए थे ।
लेकिन मानो वे रण में मृत्युंजय बने हुए थे ।।
बादल की वीरता की हद यहा तक थी कि इसी लड़ाई में उनका पेट फट चुका था । अंतड़िया बाहर आ गई थी तो भी उन्होंने लड़ना बंद नही किया , अपनी पगड़ी पेट पर बांधकर लड़ाई लड़ी ।
रण में दोनों काका-भतीजे और वीर मेवाड़ी सैनिकों के इस रौद्र प्रदर्शन का वर्णन कवि नरेन्द्र मिश्र इस प्रकार करते है-
पुण्य प्रकाशित होता है जैसे अग्रित पापों से ।
फूल खिला रहता असंख्य काटों के संतापों से ।।
वो मेवाड़ी शेर अकेला लाखों से लड़ता था ।
बढ़ा जिस तरफ वीर उधर ही विजय मंत्र पढता था ।।
इस भीषण रण से दहली थी दिल्ली की दीवारें ।
गोरा से टकरा कर टूटी खिलजी की तलवारें ।।
मगर क़यामत देख अंत में छल से काम लिया था ।
गोरा की जंघा पर अरि ने छिप कर वार किया था ।।
वहीँ गिरे वीर वर गोरा जफ़र सामने आया ।
शीश उतार दिया, धोखा देकर मन में हर्षाया ।।
गोरा-बादल | जानिए इन अविस्मरणीय राजपूत योद्धाओं के बारे में
Source: Roar Media
शीश कटने के बाद भी उन्होंने एक ही वार में खिलजी के सेनापति को मार गिराया था । इस अद्भुत दृश्य का वर्णन निम्न पंक्तियों में है ।।
मगर वाह रे मेवाड़ी गोरा का धड़ भी दौड़ा ।
किया जफ़र पर वार की जैसे सर पर गिरा हथौड़ा ।।
एक वार में ही शाही सेना पति चीर दिया था ।
जफ़र मोहम्मद को केवल धड़ ने निर्जीव किया था ।।
ज्यों ही जफ़र कटा शाही सेना का साहस लरज़ा ।
काका का धड़ देख बादल सिंह महारुद्र सा गरजा ।।
अरे कायरो नीच बाँगड़ों छल से रण करते हो ।
किस बुते पर जवान मर्द बनने का दम भरते हो ।।
यह कह कर बादल उस क्षण बिजली बन करके टुटा था ।
मानो धरती पर अम्बर से अग्नि शिरा छुटा था ।।
ज्वाला मुखी फटा हो जैसे दरिया हो तूफानी ।
सदियां दोहराएंगी बादल की रण रंग कहानी ।।
अरि का भाला लगा पेट में आंते निकल पड़ी थीं ।
जख्मी बादल पर लाखो तलवारें खिंची खड़ी थी ।।
कसकर बाँध लिया आँतों को केशरिया पगड़ी से ।
रंचक डिगा न वह प्रलयंकर सम्मुख मृत्यु खड़ी से ।।
अब बादल तूफ़ान बन गया शक्ति बनी फौलादी ।
मानो खप्पर लेकर रण में लड़ती हो आजादी ।।
उधर वीरवर गोरा का धड़ अरिदल काट रहा था ।
और इधर बादल लाशों से भूतल पाट रहा था ।।
आगे पीछे दाएं बाएं जम कर लड़ी लड़ाई ।
उस दिन समर भूमि में लाखों बादल पड़े दिखाई ।।
मगर हुआ परिणाम वही की जो होना था ।
उनको तो कण कण अरियों के शोणित से धोना था ।।
मेवाड़ी सीमा में राणा सकुशल पहुच गए थे ।
गोरा बादल तिल तिल कटकर रण में खेत रहे थे ।।
एक एक कर मिटे सभी मेवाड़ी वीर सिपाही ।
रत्न सिंह पर लेकिन रंचक आँच न आने पायी ।।
गोरा बादल के शव पर भारत माता रोई थी ।
उसने अपनी दो प्यारी ज्वलंत मणियां खोयी थी
गोरा-बादल
भारत की पावन धरती ने कई महान एवं वीर, पराक्रमी योद्धाओं को जन्म दिया है। गोरा एवं बादल उन्ही वीर योद्धाओं में से एक है ,ये धरती हमेशा उनकी कृतज्ञ रहेगी! तो आइए जानते हैं उन दो महान योद्धाओं के बारे में
गोरा-बादल
जानिए इन अविस्मरणीय राजपूत योद्धाओं के बारे में
गोरा तत्कालीन चित्तौड़ के सेनापति थे एवं बादल उनके भतीजे थे। दोनो अत्यंत ही वीर एवं पराक्रमी योद्धा थे, उनके साहस, बल एवं पुरुषार्थ से सारे शत्रु डरते थे। गोरा एवं बादल इतिहास के उन गिने चुने लड़ाकों में से एक थे जिनके पास बाहुबल के साथ साथ तीव्र बुद्धि भी थी।
इनकी बुद्धि एवं वीरता ने उस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया जिसे कोई और शायद ही कर पाता ।
ये ऐसे योद्धा थे जो दिल्ली जाकर खिलजी की कैद से राणा रतन सिंह को छुड़ा लाये थे । इस युद्ध में जब गोरा ने खिलजी के सेनापति को मारा था तब तक उनका खुद का शीश पहले ही कट चुका था, केवल धड़ शेष रहा था । यह सब कैसे संभव हुआ इसका वर्णन मैं मेवाड़ के राज कवि श्री श्री नरेन्द्र मिश्र की अत्यंत खूबसूरत कविता के छोटे से अंश से करता हूँ ।
बात उस समय की है जब खिलजी ने धोके से राणा रतन सिंह को कैद कर लिया था, जब राणा जी दिल्ली में खिलजी की कैद में थे तब रानी पद्मिनी गोरा के पास गयीं; गोरा सिंह रानी पद्मिनी को वचन देते हुए कहते है कि –
जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा ।
महाकाल से भी राणा का मस्तक नही कटेगा ।।
तुम निशिन्त रहो महलो में देखो समर भवानी ।
और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारो का पानी ।।
राणा के सकुशल आने तक गोरा नही मरेगा ।
एक पहर तक सर तटने पर भी धड़ युद्ध करेगा।।
एकलिंग की शपथ महाराणा वापस आएंगे ।
महाप्रलय के घोर प्रभंजक भी ना रोक पाएंगे ।।
यह शपथ लेकर महावीर गोरा, राणा जी को वापस चित्तौड़ लेन की योजना बनाने लगे ।
योजना के बन जाने पर वीर गोरा ने आदेश दिया कि –
गोरा का आदेश हुआ सजगये सातसौ डोले ।
और बांकुरे बादल से गोरा सेनापति बोले ।।
खबर भेज दो खिलजी पर पद्मिनी स्वंय आती है ।
अन्य सातसौ सतिया भी वो संग लिए आती है ।।
जब यह खबर खिलजी तक पहुँची तो वो खुशी के मारे नाचने लगा ,उसको लगा कि वो जीत गया है। लेकिन ऐसा नहीं था ,पालकियों में तो सशस्त्र सैनिक बैठे थे । एवं पालकी ढ़ोने वाले भी कुशल सैनिक थे ।।
और सातसौ सैनिक जो कि यम से भी भीड़ सकते थे ।
हर सैनिक सेनापति था लाखो से लड़ सकते थे ।।
एक–एक कर बैठ गए, सज गई डोलियां पल में ।
मर मिटने की हौड़ लगी थी मेवाड़ी दल में ।।
हर डोली में एक वीर , चार उठाने वाले ।
पांचो ही शंकर की तरह समर भत वाले ।।
सैनिकों से भरी पालकियां दिल्ली पहुँच गई ।
जा पहुंची डोलियां एक दिन खिलजी की सरहद में ।
उस पर दूत भी जा पहुँचा खिलजी के रंग महल में।।
बोला शहंशाह पद्मिनी मल्लिका बनने आयी है ।
रानी अपने साथ हुस्न की कालिया भी लायी है ।।
एक मगर फरियाद फ़क़्त उसकी पूरी करवादो ।
राणा रतन सिंह से केवल एक बार मिलवादो ।।
गोरा-बादल | जानिए इन अविस्मरणीय राजपूत योद्धाओं के बारे में
दूत की यह बात सुनकर मुगल उछल पड़ा , उसने तुरंत ही राणा जी से पद्मिनी को मिलवाने का हुक्म दे दिया । जब ये बात गोरा के दूत ने बाहर आकर बताई तब गोरा ने बादल से कहा कि –
बोले बेटा वक़्त आगया है कट मरने का ।
मातृ भूमि मेवाड़ धारा का दूध सफल करने का ।।
यह लोहार पद्मिनी वेश में बंदीगृह जाएगा ।
केवल दस डोलियां लिए गोरा पीछे ढायेगा ।।
यह बंधन काटेगा हम राणा को मुक्त करेंगे।
घुड़सवार कुछ उधर आड़ में ही तैयार रहेंगे।।
जैसे ही राणा आएं वो सब आंधी बन जाएँ।
और उन्हें चित्तोड़ दुर्ग पर वो सकुशल पहुंचाएं।।
गोरा की बुद्धि का यह उत्कृष्ट उदाहरण था । दिल्ली में जहाँ खिलजी की पूरी सेना खड़ी है, वहाँ ये चंद मेवाड़ी सिपाही अपनी योजना, बुद्धि एवं साहस से राणा को छुड़ाने में कामयाब हो जाते हैं। राणा के वहाँ से प्रस्थान करने से पूर्व वीर गोरा, अपने भतीजे बादल से कहते है कि –
राणा जाएं जिधर शत्रु को उधर न बढ़ने देना।
और एक यवन को भी उस पथ पावँ ना धरने देना।।
मेरे लाल लाडले बादल आन न जाने पाए ।
तिल तिल कट मरना मेवाड़ी मान न जाने पाए ।।
यह सुनकर बादल बोले कि –
ऐसा ही होगा काका राजपूती अमर रहेगी ।
बादल की मिट्टी में भी गौरव की गंध रहेगी ।।
बादल के ये वचन सुनकर गोरा ने उसे अपने हृदय से लगा लिया!!! लेकिन इस पूरी योजना का क्रियान्वय किस प्रकार हुआ इसका वर्णन महा कवि श्री श्री नरेंद्र मिश्र कि निम्न पंक्तिया करती है –
गोरा की चातुरी चली राणा के बंधन काटे ।
छांट छांट कर शाही पहरेदारो के सर काटे ।।
लिपट गए गोरा से राणा गलती पर पछताए ।
सेनापति की नमक हलाली देख नयन भर आये ।।
राणा ने पूर्व में जिस सेनापति का तिरस्कार किया था , संकट की घड़ी में आखिर वो ही काम आया ।यह देख कर राणा के नैन भर आए ।। लेकिन अब तक खिलजी के सेनापति को लग गया था कि कुछ गड़बड़ है ।
जब उसने लिया समझ पद्मिनी नहीँ आयी है।
मेवाड़ी सेना खिलजी की मौत साथ लायी है ।।
तो उसने पहले से तैयार सैनिक दल को बुलाया और रण छेड़ दिया ।
दृष्टि फिरि गोरा की मानी राणा को समझाया ।
रण मतवाले को रोका जबरन चित्तोड़ पठाया ।।
उस समय राणा को सुरक्षित अपने देश पहुचना तथा शत्रु देश से निकलना अधिक महत्वपूर्ण था, राणा ने परिस्थिति को समझा और मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया ।।
खिलजी ललकारा दुश्मन को भाग न जाने देना ।
रत्न सिंह का शीश काट कर ही वीरों दम लेना ।।
टूट पड़ों मेवाड़ी शेरों बादल सिंह ललकारा ।
हर हर महादेव का गरजा नभ भेदी जयकारा ।।
निकल डोलियों से मेवाड़ी बिजली लगी चमकने ।
काली का खप्पर भरने तलवारें लगी खटकने ।।
राणा के पथ पर शाही सेनापति तनिक बढ़ा था ।
पर उस पर तो गोरा हिमगिरि सा अड़ा खड़ा था।।
कहा ज़फर से एक कदम भी आगे बढ़ न सकोगे ।
यदि आदेश न माना तो कुत्ते की मौत मरोगे ।।
रत्न सिंह तो दूर न उनकी छाया तुम्हें मिलेगी ।
दिल्ली की भीषण सेना की होली अभी जलेगी ।।
यह कह के महाकाल बन गोरा रण में हुंकारा ।
लगा काटने शीश बही समर में रक्त की धारा ।।
खिलजी की असंख्य सेना से गोरा घिरे हुए थे ।
लेकिन मानो वे रण में मृत्युंजय बने हुए थे ।।
बादल की वीरता की हद यहा तक थी कि इसी लड़ाई में उनका पेट फट चुका था । अंतड़िया बाहर आ गई थी तो भी उन्होंने लड़ना बंद नही किया , अपनी पगड़ी पेट पर बांधकर लड़ाई लड़ी ।
रण में दोनों काका-भतीजे और वीर मेवाड़ी सैनिकों के इस रौद्र प्रदर्शन का वर्णन कवि नरेन्द्र मिश्र इस प्रकार करते है-
पुण्य प्रकाशित होता है जैसे अग्रित पापों से ।
फूल खिला रहता असंख्य काटों के संतापों से ।।
वो मेवाड़ी शेर अकेला लाखों से लड़ता था ।
बढ़ा जिस तरफ वीर उधर ही विजय मंत्र पढता था ।।
इस भीषण रण से दहली थी दिल्ली की दीवारें ।
गोरा से टकरा कर टूटी खिलजी की तलवारें ।।
मगर क़यामत देख अंत में छल से काम लिया था ।
गोरा की जंघा पर अरि ने छिप कर वार किया था ।।
वहीँ गिरे वीर वर गोरा जफ़र सामने आया ।
शीश उतार दिया, धोखा देकर मन में हर्षाया ।।
गोरा-बादल | जानिए इन अविस्मरणीय राजपूत योद्धाओं के बारे में
Source: Roar Media
शीश कटने के बाद भी उन्होंने एक ही वार में खिलजी के सेनापति को मार गिराया था । इस अद्भुत दृश्य का वर्णन निम्न पंक्तियों में है ।।
मगर वाह रे मेवाड़ी गोरा का धड़ भी दौड़ा ।
किया जफ़र पर वार की जैसे सर पर गिरा हथौड़ा ।।
एक वार में ही शाही सेना पति चीर दिया था ।
जफ़र मोहम्मद को केवल धड़ ने निर्जीव किया था ।।
ज्यों ही जफ़र कटा शाही सेना का साहस लरज़ा ।
काका का धड़ देख बादल सिंह महारुद्र सा गरजा ।।
अरे कायरो नीच बाँगड़ों छल से रण करते हो ।
किस बुते पर जवान मर्द बनने का दम भरते हो ।।
यह कह कर बादल उस क्षण बिजली बन करके टुटा था ।
मानो धरती पर अम्बर से अग्नि शिरा छुटा था ।।
ज्वाला मुखी फटा हो जैसे दरिया हो तूफानी ।
सदियां दोहराएंगी बादल की रण रंग कहानी ।।
अरि का भाला लगा पेट में आंते निकल पड़ी थीं ।
जख्मी बादल पर लाखो तलवारें खिंची खड़ी थी ।।
कसकर बाँध लिया आँतों को केशरिया पगड़ी से ।
रंचक डिगा न वह प्रलयंकर सम्मुख मृत्यु खड़ी से ।।
अब बादल तूफ़ान बन गया शक्ति बनी फौलादी ।
मानो खप्पर लेकर रण में लड़ती हो आजादी ।।
उधर वीरवर गोरा का धड़ अरिदल काट रहा था ।
और इधर बादल लाशों से भूतल पाट रहा था ।।
आगे पीछे दाएं बाएं जम कर लड़ी लड़ाई ।
उस दिन समर भूमि में लाखों बादल पड़े दिखाई ।।
मगर हुआ परिणाम वही की जो होना था ।
उनको तो कण कण अरियों के शोणित से धोना था ।।
मेवाड़ी सीमा में राणा सकुशल पहुच गए थे ।
गोरा बादल तिल तिल कटकर रण में खेत रहे थे ।।
एक एक कर मिटे सभी मेवाड़ी वीर सिपाही ।
रत्न सिंह पर लेकिन रंचक आँच न आने पायी ।।
गोरा बादल के शव पर भारत माता रोई थी ।
उसने अपनी दो प्यारी ज्वलंत मणियां खोयी थी
द्वन्द कहाँ तक पाला जाए,युद्ध कहाँ तक टाला जाए..तु भी है राणा का वंशज,फेंक जहाँ तक भाला जाए।

चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
रखता था भूतल पानी को।
राणा प्रताप सिर काट काट,
करता था सफल जवानी को॥
कलकल बहती थी रणगंगा,
अरिदल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी,
चटपट उस पार लगाने को॥
वैरी दल को ललकार गिरी,
वह नागिन सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो बचो,
तलवार गिरी तलवार गिरी॥
पैदल, हयदल, गजदल में,
छप छप करती वह निकल गई।
क्षण कहाँ गई कुछ पता न फिर,
देखो चम-चम वह निकल गई॥
क्षण इधर गई क्षण उधर गई,
क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई।
था प्रलय चमकती जिधर गई,
क्षण शोर हो गया किधर गई॥
लहराती थी सिर काट काट,
बलखाती थी भू पाट पाट।
बिखराती अवयव बाट बाट,
तनती थी लोहू चाट चाट॥
क्षण भीषण हलचल मचा मचा,
राणा कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह,
रण-चंडी जीभ पसार बढ़ी॥
The Journey Begins
Thanks for joining me!
Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

